Friday, March 13, 2026
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निवारक स्वास्थ्य देखभाल में अग्रणी भूमिका निभा रहा है योग

बीते दशक में योग को केवल पारंपरिक स्वास्थ्य पद्धति के रूप में ही नहीं सराहा गया, बल्कि उसे उत्‍तरोत्‍तर रूप से स्वास्थ्य और कल्याण के लिए साक्ष्य-आधारित दृष्टिकोण के रूप में भी पहचाना जाने लगा है। वैज्ञानिक अनुसंधान, डिजिटल नवाचार और वैश्विक सहयोग अब हमें योग को केवल भारत की सांस्कृतिक विरासत ही नहीं, बल्कि एक सशक्‍त जन-स्वास्थ्य हस्तक्षेप समझने में भी मदद कर रहे हैं।
मोररजी देसाई राष्‍ट्रीय योग संस्‍थान (एमडीएनआईवाई) को पारंपरिक चिकित्सा (योग) के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन के सहयोगी केंद्र के रूप में नामित किया गया है और योग अनुसंधान में भारत की नेतृत्वकारी भूमिका और भी मज़बूती प्रदान करते हुए वर्ष 2025–2029 के लिए इसे फिर से निमित किया गया है। यह पहचान गैर-संचारी रोग (एनसीडी) के लिए साक्ष्य-आधारित योग हस्‍तक्षेपों को बढ़ावा देने में संस्‍थान की बढ़ती भूमिका को दिखाती है। इस पहल के प्रमुख साझेदारों में आयुष मंत्रालय, एम्‍स दिल्ली, लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज, केंद्रीय यूनानी चिकित्सा अनुसंधान परिषद, और इंस्टीट्यूट ऑफ़ न्यूक्लियर मेडिसिन एंड एलाइड साइंसेज, दिल्ली शामिल हैं।
इन सहयोगों के माध्यम से केंद्र मधुमेह, मोटापा और तनाव से संबंधित विकारों जैसे गैर-संचारी रोगों के लिए योग-आधारित हस्तक्षेपों पर तकनीकी दिशानिर्देश विकसित कर रहा है और अनुसंधान को आगे बढ़ा रहा है। इन प्रयासों में अंतरराष्ट्रीय संगठन भी साझेदारी कर रहे हैं, जिससे योग की वैज्ञानिक आधारशिला और मजबूत हो रही है तथा निवारक स्वास्थ्य देखभाल के लिए व्यापक रूप से लागू किए जा सकने वाले, किफायती और साक्ष्य-समर्थित प्रभावी साधन के तौर पर योग की क्षमता प्रदर्शित हो रही है।
संस्थागत स्तर पर एमडीएनआईवाई योग की वैज्ञानिक आधारशिला को मजबूती प्रदान करना जारी रखे हुए है। शरीर क्रिया विज्ञान, जैव रसायन, बायोमैकेनिक्स और मनोविज्ञान की अनुसंधान प्रयोगशालाओं के माध्यम से यह संस्थान योग के मनो-शारीरिक और जैव-रासायनिक प्रभावों, उम्र बढ़ने में इसकी भूमिका तथा जीवनशैली से जुड़े विकारों पर इसके प्रभाव का अध्ययन करता है। यह कार्य पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक प्रमाणों के साथ जोड़ने की दिशा में भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाता है
डिजिटल प्‍लेटफॉर्मों ने योग की पहुँच को और अधिक बढ़ाया है, जिससे साक्ष्य-आधारित पद्धतियाँ सीधे लोगों के दैनिक जीवन का हिस्सा बन रही हैं। m-Yoga मोबाइल एप्लिकेशन और Y-Break प्रोटोकॉल जैसे प्रयास यह दिखाते हैं कि योग की प्रामाणिकता और चिकित्सकीय महत्‍व बनाए रखते हुए उसे बड़े स्तर पर पहुँचाया जा सकता है। विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन के सहयोग से विकसित किए गए m-Yoga प्लेटफॉर्म पर 1.1 लाख से अधिक डाउनलोड दर्ज किए जा चुके हैं, जो सुलभ डिजिटल वेलनेस टूल्स में बढ़ती रुचि को दर्शाता है। वहीं कार्यस्थल योग कार्यक्रम Y-Break — जो काम के दौरान 5–10 मिनट का सरल योग ब्रेक है — से अब तक 33 लाख से अधिक सरकारी अधिकारियों को लाभ मिल चुका है।
इन पहलों से प्राप्त अनुसंधान निष्कर्ष और सहभागिता विश्लेषण अत्यंत उत्साहजनक हैं। Y Break अभ्यास से कुछ ही सप्ताहों में अनुभूत तनाव में लगभग 40 प्रतिशत तक कमी देखी गई है। अध्ययनों से यह भी पता चलता है कि इससे मानसिक सतर्कता, भावनात्मक दृढ़ता और निर्णय-क्षमता में सुधार होता है। इसके साथ-साथ कॉर्टिसोल स्तर जैसे शारीरिक संकेतकों में भी सकारात्मक परिवर्तन पाए गए हैं।
शारीरिक लाभों में गर्दन, कंधे और कमर के दर्द में कमी, श्वास अभ्यास से सांस लेने की क्षमता में सुधार और संपूर्ण जीवन शक्ति में वृद्धि शामिल हैं—ये परिणाम विशेषकर आज के निष्क्रिय, स्क्रीन-आधारित कार्यस्थलों में प्रासंगिक हैं। Y-Break अभ्यास ने अनुपस्थिति में कमी लाने , कर्मचारियों के मनोबल में सुधार लाने, और कार्य–जीवन में स्वस्थ संतुलन कायम करने में भी योगदान दिया है, जो व्यक्तिगत और संगठनात्मक कल्याण दोनों को मजबूत बनाने की योग की क्षमता को दर्शाता है।
एमडीएनआईवाई और केंद्रीय योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा अनुसंधान परिषद द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित राष्ट्रीय प्राकृतिक चिकित्सा सम्मेलन–2026 के दौरान भी वैज्ञानिक प्रमाण के महत्‍व पर जोर दिया गया। विशेषज्ञों ने यह रेखांकित किया कि सुदृढ़ अनुसंधान, अंतरविषयक सहयोग, और प्रभावी डिजिटल सहभागिता आधुनिक स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों में योग को एकीकृत करने और स्‍पष्‍ट स्वास्थ्य परिणाम सुनिश्चित करने के लिए अनिवार्य हैं।
ये घटनाक्रम योग के प्रति वैश्विक दृष्टिकोण में महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाते हैं। अब इसे केवल व्यक्तिगत कल्याण के अभ्यास के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि यह उत्‍तरोत्‍तर रूप से जन-स्वास्थ्य, कौशल विकास और वेलनेस आधारित रोजगार के अवसरों के एक मार्ग के रूप में उभर रहा है। योग परंपरा को विज्ञान और प्रौद्योगिकी के साथ जोड़ते हुए ग्लोबल योग क्रांति की प्रेरक शक्ति के रूप में उभर रहा है तथा अंतरराष्ट्रीय वेलनेस क्षेत्र में भारत के नेतृत्व को और मजबूत कर रहा है।
जैसे-जैसे हम 13 मार्च के करीब पहुँच रहे हैं, जो 21 जून को मनाए जाने वाले अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के 100-दिन के काउंटडाउन का संकेत है, यह हमें इस बारे में सोचने का अवसर देता है कि किस प्रकार योग एक प्राचीन पद्धति से लेकर वैश्विक रूप से मान्यता प्राप्त, साक्ष्य-आधारित स्वास्थ्य और कल्याण मार्ग के रूप में विकसित हो गया है। ये सौ दिन हमें याद दिलाएं कि हम दैनिक योग अभ्यास शुरू करें या उसे नवीनीकृत करें, और अपने परिवार, मित्रों और समुदायों को योग को जीवन जीने का तरीका बनाने के लिए प्रेरित करें।
योग को दैनिक जीवन में शामिल करके, हम केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य को ही मजबूत नहीं करते, बल्कि सामूहिक कल्याण, संगठनात्मक दक्षता और सामाजिक समरसता को भी बढ़ावा देते हैं। आज, अनुसंधान, प्रौद्योगिकी और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से, भारत योग की अनंत ज्ञान परंपरा को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित और सार्वभौमिक रूप से सुलभ मार्ग में बदलने का अगला निर्णायक कदम उठा रहा है, जो वैश्विक स्वास्थ्य, संतुलन और कल्याण के लिए मार्गदर्शक बन सकेगा।

-प्रतापराव जाधव
(लेखक आयुष मंत्रालय के स्वतंत्र प्रभार वाले केंद्रीय राज्य मंत्री और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के राज्य मंत्री हैं।)

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