Friday, October 16, 2026
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केजीएमयू में देश का पहला प्रेसिजन मेडिसिन सेंटर ऑफ एक्सीलेंस स्थापित

गंभीर मरीजों को मिलेगा सटीक इलाज

लखनऊ। किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) के क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग को उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से प्रेसिजन मेडिसिन इन एक्यूट केयर का सेंटर ऑफ एक्सीलेंस घोषित किया गया है। इस उपलब्धि से गंभीर रूप से बीमार मरीजों के इलाज में नई संभावनाएं खुलेंगी। इस तकनीक की मदद से मरीज की बीमारी, संक्रमण फैलाने वाले बैक्टीरिया, जेनेटिक प्रोफाइल और दवाओं के प्रति शरीर की प्रतिक्रिया के आधार पर उपचार तय करने में मदद मिलेगी। खासतौर पर सेप्सिस जैसी गंभीर स्थिति में संक्रमण फैलाने वाले बैक्टीरिया की जल्द पहचान करके सही एंटीबायोटिक देने की संभावना बढ़ेगी। इससे इलाज में लगने वाला समय कम करने, मरीज के जल्द स्वस्थ होने और अनावश्यक महंगी दवाओं के इस्तेमाल को रोकने में मदद मिल सकती है।

गुरुवार को केजीएमयू की कुलपति प्रो. सोनिया नित्यानंद ने पत्रकार वार्ता के दौरान इस उपलब्धि की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग ने अपने स्तर पर आवश्यक उपकरणों और जांच सुविधाओं को विकसित किया है। विभाग में गंभीर मरीजों के बेहतर उपचार के लिए आधुनिक तकनीकों को अपनाने और जांच की क्षमताओं को मजबूत करने की दिशा में काम किया गया है। विभाग के प्रयासों और विकसित की गई सुविधाओं को देखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार ने इसे सेंटर ऑफ एक्सीलेंस का दर्जा दिया है। इससे गंभीर बीमारियों के उपचार में आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों के इस्तेमाल को बढ़ावा मिलेगा और मरीजों को उनकी जरूरत के अनुसार इलाज उपलब्ध कराने की दिशा में मदद मिलेगी।

प्रो. सोनिया नित्यानंद ने बताया कि प्रेसिजन मेडिसिन का उद्देश्य प्रत्येक मरीज की स्थिति के अनुसार सटीक उपचार उपलब्ध कराना है। सामान्य चिकित्सा पद्धति में एक बीमारी से पीड़ित कई मरीजों को प्रायः एक जैसी दवाएं दी जाती हैं, लेकिन सभी मरीजों के शरीर पर किसी दवा का असर समान नहीं होता। मरीज की उम्र, बीमारी की गंभीरता, संक्रमण के प्रकार और आनुवंशिक विशेषताओं के कारण दवाओं की प्रतिक्रिया अलग-अलग हो सकती है। प्रेसिजन मेडिसिन में इन पहलुओं को ध्यान में रखकर उपचार की योजना बनाई जाती है। इससे मरीज को ऐसी दवा देने में मदद मिल सकती है, जो उसकी बीमारी पर अधिक प्रभावी हो और जिसके दुष्प्रभाव की आशंका भी कम हो।
उन्होंने बताया कि सेप्सिस के मरीजों में संक्रमण फैलाने वाले बैक्टीरिया की पहचान करना और यह पता लगाना बेहद जरूरी होता है कि कौन-सी एंटीबायोटिक उस बैक्टीरिया पर प्रभावी होगी। सेप्सिस एक गंभीर स्थिति है, जिसमें संक्रमण के प्रति शरीर की प्रतिक्रिया के कारण अंगों को नुकसान पहुंचने का खतरा हो सकता है। ऐसे मरीजों में समय पर सही उपचार नहीं मिलने पर स्थिति तेजी से बिगड़ सकती है। इसलिए शुरुआती चरण में प्रभावी एंटीबायोटिक का चयन करना महत्वपूर्ण होता है।

वर्तमान में बैक्टीरिया की पहचान के लिए ब्लड कल्चर जैसी जांच की जाती है। इसकी रिपोर्ट आने में समय लग सकता है। रिपोर्ट मिलने के बाद पता चलता है कि संक्रमण फैलाने वाला बैक्टीरिया कौन-सा है और किन दवाओं से उसे नियंत्रित किया जा सकता है। इस बीच चिकित्सकों को मरीज की स्थिति और उपलब्ध जानकारी के आधार पर उपचार शुरू करना पड़ता है। प्रेसिजन मेडिसिन और आधुनिक आणविक जांच तकनीकों से बैक्टीरिया की पहचान तथा एंटीबायोटिक के प्रति उसकी संवेदनशीलता का पता लगाने में मदद मिल सकती है। इससे उपचार के दौरान सही दवा का चयन करने की प्रक्रिया को बेहतर बनाया जा सकेगा।
क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग के प्रमुख डॉ. अविनाश अग्रवाल ने बताया कि उत्तर प्रदेश सरकार ने इसे प्रेसिजन मेडिसिन इन एक्यूट केयर का देश का पहला सेंटर ऑफ एक्सीलेंस बनाया है। उनके अनुसार, देश में इससे पहले इस प्रकार का सेंटर उपलब्ध नहीं था। उन्होंने कहा कि इस पहल का सबसे बड़ा लाभ गंभीर मरीजों को समय पर सही दवा उपलब्ध कराने के रूप में सामने आएगा। जब मरीज की बीमारी और संक्रमण की प्रकृति के अनुरूप दवा दी जाएगी, तो उसके स्वस्थ होने की संभावना बेहतर हो सकती है। साथ ही, ऐसी दवाओं के इस्तेमाल से बचा जा सकेगा, जो संबंधित मरीज पर प्रभावी नहीं हैं।
डॉ. अग्रवाल ने बताया कि एंटीबायोटिक के अनावश्यक इस्तेमाल को रोकना भी इस तकनीक का महत्वपूर्ण उद्देश्य है। कई बार संक्रमण की सही पहचान नहीं होने या दवा के प्रभाव का स्पष्ट पता नहीं चलने के कारण उपचार के दौरान एंटीबायोटिक बदलनी पड़ती है। कुछ मामलों में अधिक महंगी दवाओं का इस्तेमाल भी करना पड़ सकता है। प्रेसिजन मेडिसिन से उपलब्ध जांच परिणामों के आधार पर दवा के चयन में सहायता मिलेगी। इससे अनावश्यक दवाओं के इस्तेमाल और उनसे होने वाले संभावित दुष्प्रभावों को कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, मरीज को दवा देने और उपचार में बदलाव का अंतिम निर्णय चिकित्सक उसकी पूरी स्थिति को देखते हुए करेंगे।
उन्होंने बताया कि प्रेसिजन मेडिसिन का उपयोग केवल संक्रमण के उपचार तक सीमित नहीं है, बल्कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों में भी इसकी भूमिका महत्वपूर्ण हो रही है। कैंसर के मरीजों में मौजूद जेनेटिक म्यूटेशन यानी आनुवंशिक बदलावों की पहचान करके उपचार और दवाओं का चयन किया जा सकता है। इससे मरीज की बीमारी की विशेषताओं के अनुसार इलाज की योजना बनाने में मदद मिलती है। इसी प्रकार, कुछ लोगों के शरीर में आनुवंशिक कारणों से दवाओं का टूटना या उनका चयापचय सामान्य से धीमा अथवा तेज हो सकता है। ऐसे मामलों में मरीज की जरूरत के अनुरूप दवा की खुराक तय करने में भी प्रेसिजन मेडिसिन उपयोगी साबित हो सकती है।

इस यूनिट को चलाने के लिए सरकार ने कोई अलग से बजट दिया है के सवाल पर केजीएमयू के डीन डॉ के के सिंह ने कहा कि इस यूनिट को सरकार द्वारा मान्यता मिल चुकी है और आगे इसके लिए बजट माँगा जाएगा,फिरहाल अभी जो के जी एम यू का बजट है उसी से इसका संचालन किया जा रहा है।

केजीएमयू के क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग में आणविक जीव विज्ञान से संबंधित जांच सुविधाओं और आधुनिक तकनीकों को विकसित करने पर भी काम किया जा रहा है। इन प्रयासों का उद्देश्य गंभीर मरीजों में बीमारी की पहचान, संक्रमण के कारणों और दवाओं की प्रभावशीलता से जुड़ी जानकारी को बेहतर बनाना है। इससे चिकित्सकों को उपचार संबंधी निर्णय लेने में वैज्ञानिक आधार मिलेगा। खासतौर पर गहन चिकित्सा इकाई में भर्ती उन मरीजों के लिए यह तकनीक महत्वपूर्ण हो सकती है, जिनकी हालत गंभीर होती है और जिनके उपचार में समय की विशेष अहमियत होती है।
केजीएमयू में सेंटर ऑफ एक्सीलेंस की स्थापना को गंभीर बीमारियों के आधुनिक उपचार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इससे मरीजों को उनकी बीमारी और जरूरत के अनुसार उपचार उपलब्ध कराने, एंटीबायोटिक के विवेकपूर्ण इस्तेमाल को बढ़ावा देने और चिकित्सा सुविधाओं को मजबूत करने में मदद मिलने की उम्मीद है।

अज़मत अली
सुमन सुप्रभात
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