Tuesday, August 11, 2026
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सामाजिक न्याय पर लगे उस प्रतिबंध की याद दिलाता है 10 अगस्त 1950 : अनीस मंसूरी

लखनऊ10 अगस्त। पसमांदा मुस्लिम समाज के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व मंत्री अनीस मंसूरी ने कहा कि “आज 10 अगस्त है।इसी दिन वर्ष 1950 में अनुसूचित जातियों से संबंधित संवैधानिक आदेश लागू किया गया था, जिसके पैरा-3 में अनुसूचित जाति की पहचान को धर्म से जोड़ दिया गया। यह प्रावधान सामाजिक न्याय की भावना पर एक गंभीर सवालिया निशान है और इसे अब और जारी नहीं रखा जा सकता।
अनीस मंसूरी ने कहा कि अगर जातिगत भेदभाव किसी व्यक्ति को उसका धर्म देखकर नहीं झेलना पड़ता, तो फिर सामाजिक न्याय और संवैधानिक संरक्षण का अधिकार भी धर्म देखकर क्यों तय किया जाए? एक ही जाति और समान सामाजिक परिस्थितियों से आने वाले दो व्यक्तियों में सिर्फ धर्म के आधार पर संवैधानिक अधिकारों का अंतर आखिर किस न्याय का हिस्सा है?
उन्होंने कहा कि 1950 में लागू व्यवस्था ने दलितों के संवैधानिक अधिकारों को धार्मिक पहचान से जोड़ दिया।
बाद में 1956 में सिखों और 1990 में बौद्धों को इसमें शामिल किया गया, लेकिन मुस्लिम और ईसाई दलितों को आज भी इस दायरे से बाहर रखा गया है। यह भेदभाव अब संविधान की समानता और धर्मनिरपेक्षता की कसौटी पर खरा नहीं उतरता।
मंसूरी ने कहा कि जाति किसी धर्म की जागीर नहीं है और न ही सामाजिक उत्पीड़न का कोई धार्मिक चेहरा होता है। अगर किसी समुदाय के लोग सदियों से जातिगत भेदभाव, आर्थिक पिछड़ेपन और सामाजिक वंचना का सामना करते रहे हैं, तो उनके साथ न्याय का पैमाना भी समान होना चाहिए।
उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की कि संविधान (अनुसूचित जातियां) आदेश, 1950 के पैरा-3 से धर्म आधारित प्रतिबंध को तत्काल समाप्त किया जाए और दलित मुस्लिम एवं दलित ईसाई समुदायों को भी समान संवैधानिक अधिकार दिए जाएं।
अनीस मंसूरी ने तल्ख लहजे में कहा, “आज 10 अगस्त है—वह तारीख जिसे पसमांदा समाज अपने सामाजिक अधिकारों पर लगे उस धार्मिक ताले की याद के रूप में देखता है।
लोकतंत्र में किसी इंसान की सामाजिक पीड़ा का फैसला उसके मजहब से नहीं हो सकता। अगर संविधान सबको बराबरी देता है, तो बराबरी का दरवाज़ा किसी धर्म के नाम पर बंद रखने का यह सिलसिला अब खत्म होना चाहिए। सरकार तय करे कि उसे 1950 की उस विसंगति को ढोना है या 2026 के भारत में सामाजिक न्याय को सचमुच धर्मनिरपेक्ष बनाना है।

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