लखनऊ। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी ओल्ड बॉयज़ एसोसिएशन (अमूबा) लखनऊ की ओर से रविवार शाम शहर के एक होटल में आयोजित कार्यक्रम में प्रख्यात उर्दू कॉलम लेखक, साहित्यकार और पत्रकार मासूम मुरादाबादी की कृति “डॉ. अब्दुल जलील फरीदी—क़ायदे मिल्लत, मसीहाए क़ौम” का लोकार्पण किया गया।
इस अवसर पर मेहमानों का स्वागत करते हुए एसोसिएशन की मानद सचिव शहला हक़ ने कहा कि उन्हें गर्व है कि एसोसिएशन के बैनर तले आज उस व्यक्तित्व को याद किया जा रहा है, जिसने अलीग न होते हुए भी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के अल्पसंख्यक स्वरूप की बहाली के आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और इसकी सज़ा के तौर पर उन्हें जेल भी जाना पड़ा।

कार्यक्रम का संचालन करते हुए एसोसिएशन के अध्यक्ष सैयद मोहम्मद शोएब ने डॉ. फ़रीदी से अपने परिवार के पुराने संबंधों पर प्रकाश डाला और कहा कि वे उन खुशकिस्मत लोगों में हैं जिन्होंने डॉ. फरीदी को क़रीब से देखा। उन्होंने बताया कि 1965 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में उत्पन्न परिस्थितियों, जिसके बाद विश्वविद्यालय का अल्पसंख्यक दर्जा समाप्त कर दिया गया, ने डॉ. फरीदी के मन पर गहरा प्रभाव डाला और वे इस अन्याय के खिलाफ अलीग बिरादरी के साथ न सिर्फ़ खड़े हुए, बल्कि इस आंदोलन की अगवाई भी की।
मोहम्मद ओवैस संभली ने पुस्तक का परिचय प्रस्तुत करते हुए उसमें शामिल कई लेखों के अंश पढ़े। उद्घाटन भाषण में ‘पद्मश्री’ परवीन तल्हा ने कार्यक्रम के आयोजन के लिए एसोसिएशन की सराहना की और कहा कि मासूम मुरादाबादी की यह कोशिश हमें डॉ. फ़रीदी के विचारों और सिद्धांतों से परिचित कराती है, इसलिए हमारा कर्तव्य है कि इन विचारों को केवल एक कार्यक्रम तक सीमित न रखकर उनके प्रसार के लिए प्रयास जारी रखें।
डॉ. सुहैल अहमद फारूक़ी ने डॉ. फ़रीदी की एक चिकित्सक के रूप में मानव सेवा पर प्रकाश डालते हुए बताया कि उन्होंने सप्ताह का एक दिन गरीबों के मुफ़्त इलाज के लिए निर्धारित कर रखा था।

मुख्य वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए प्रख्यात चिंतक व विचारक डॉ. मसूदुल हसन उस्मानी ने कहा कि स्वतंत्रता के बाद जिन प्रमुख हस्तियों ने राष्ट्रीय और सामुदायिक समस्याओं के बीच रहते हुए भी साहस, निडरता और दृढ़ विश्वास के साथ मुसलमानों को मानसिक और नैसर्गिक शक्ति प्रदान की, उनमें डॉ. फ़रीदी का नाम प्रमुख है। वे एक सफ़ल चिकित्सक होने के साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध थे और गहरी राजनीतिक समझ रखते थे। उन्होंने मुस्लिम राजनीति को आवश्यक माना और पूरी निष्ठा के साथ इस मार्ग पर आगे बढ़ते रहे। शिक्षा, समाज, धर्म और समुदाय से जुड़े मुद्दे उनकी सोच का केंद्र रहे और उन्होंने हर क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभाई। स्वतंत्र भारत के इतिहास में उनका नाम सदैव उज्ज्वल रहेगा।
आज की युवा पीढ़ी उनकी सेवाओं से काफी हद तक अनजान है, जो दुखद है। हालांकि इसका पूरा दोष युवाओं पर नहीं डाला जा सकता, क्योंकि उन्हें अपने पूर्वजों की उपलब्धियों से अवगत कराने के गंभीर प्रयास नहीं किए गए। यह एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक जिम्मेदारी है, जिस पर अभी भी ध्यान देने की आवश्यकता है।

पुस्तक के संकलन कर्ता मासूम मुरादाबादी ने कहा कि उन्होंने डॉ. फ़रीदी को स्वयं नहीं देखा, लेकिन उनके साथ काम करने वाले लोगों से बहुत कुछ सीखा, विशेष रूप से स्वर्गीय जावेद हबीब से, जिन्होंने उन पर एक संक्षिप्त पुस्तक लिखी थी। उसी से प्रेरित होकर उन्होंने वर्षों की मेहनत के बाद यह व्यापक पुस्तक तैयार की।
उन्होंने कहा कि क़ायदे मिल्लत डॉ. अब्दुल जलील फरीदी का निधन 19 मई 1974 को लखनऊ में हुआ, जहां उन्होंने एक सफल चिकित्सक और राजनीतिक नेता के रूप में सेवाएं दीं। वे विशेष रूप से टीबी के मरीजों का मुफ़्त इलाज करते थे, लेकिन स्वयं इसी बीमारी से ग्रस्त हो गए। उनकी राजनीतिक कोशिशों का उद्देश्य मुसलमानों को एकजुट कर उनके मुद्दों का समाधान करना था, हालांकि उनके निधन के बाद यह प्रयास प्रभावी रूप से जारी नहीं रह सके।
डॉ. फ़रीदी की पोती फ़रह आरिफ़ ने विशिष्ट अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए कहा कि उन्होंने अपने दादा को नहीं देखा, लेकिन उनकी महानता के बारे में बहुत सुना है और उन्हें उनके परिवार से संबंध होने पर गर्व है।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रख्यात चिन्तक लेखक व दार्शनिक प्रोफ़ेसर रमेश दीक्षित ने कहा कि उन्हें डॉ. फ़रीदी का हमवतन होने पर गर्व है। कस्बा संडीला ने कई महान व्यक्तित्वों को जन्म दिया, जिनमें डॉ. फ़रीदी भी शामिल हैं, भले ही वे कभी वहां नहीं रहे। उन्होंने कहा कि डॉ. फ़रीदी ने मुस्लिम राजनीति को आगे बढ़ाने के साथ-साथ देश की धर्मनिरपेक्ष शक्तियों के साथ मिलकर काम करने को प्राथमिकता दी। उन्होंने फासीवाद के खिलाफ संघर्ष किया और कभी झुके नहीं। वर्तमान समय में धर्मनिरपेक्ष शक्तियों को मजबूत करने की आवश्यकता है, ताकि बढ़ती सांप्रदायिकता पर नियंत्रण लगाया जा सके। उन्होंने कहा कि भारतीय मुसलमानों की देशभक्ति पर कोई संदेह नहीं होना चाहिए और इस पर सवाल उठाने वालों को देश की आज़ादी में अपने योगदान पर विचार करना चाहिए।
अध्यक्षीय भाषण में पूर्व राज्यसभा सांसद मोहम्मद अदीब ने कहा कि डॉ. अब्दुल जलील फ़रीदी स्वतंत्र भारत के एक अद्वितीय, ईमानदार और बहुआयामी नेता थे, जिन्हें सभी सम्मान की दृष्टि से देखते थे। उनकी असमय मृत्यु ने एक बड़ा खालीपन छोड़ दिया, खासकर ऐसे समय में जब समाज को उनके जैसे नेता की आवश्यकता थी। वे न केवल एक महान राजनीतिक नेता थे, बल्कि एक उत्कृष्ट चिकित्सक भी थे, जो रोज़ाना अनेक मरीजों का मुफ़्त इलाज करते थे। अपनी संपत्ति के बावजूद उन्होंने सब कुछ समाज के लिए समर्पित कर दिया।
राजनीतिक क्षेत्र में उन्होंने मुसलमानों, दलितों और पिछड़े वर्गों की एकता के लिए प्रयास किया और 1968 में एक बड़ा सम्मेलन आयोजित किया। उनकी यही सोच आगे चलकर बहुजन आंदोलन की नींव बनी। उनका जीवन त्याग, नेतृत्व और एकता का एक उज्ज्वल उदाहरण है।
कार्यक्रम के संयोजक अनवर हबीब अलवी ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। इस अवसर पर लखनऊ और अन्य स्थानों से बड़ी संख्या में लोग उपस्थित थे, जिनमें डॉ. सुहैल अहमद फारूकी, रिज़वान अहमद (पूर्व डीजीपी), प्रो. अतीक फारूकी, तारिक फ़ैयाज़, डॉ. शकील अहमद फारूकी, मजहर सईद रिज़वी, अहमद हुसैन, मुईनुद्दीन, मोहम्मद मुहीउद्दीन, अशअर अलीग, हिना जाफरी, डॉ. ज़ेबा सिद्दीकी, शाज़िया फारूकी, राना तैयब, इमराना आज़मत, मेराज सिद्दीकी, हकीम वसीम अहमद आज़मी, परवेज़ मलिकज़ादा, प्रो. रेशमा परवीन, डॉ. उमैर मंज़र, अमीक़ जामई, मोहम्मद आज़म खान, तारिक़ सिद्दीकी, शबाब बहराइची, एहतेशाम ख़ान, मोहम्मद खालिद, राशिद खान नदवी, अब्दुल्लाह साक़िब, एस.एम. हुसैनी, खालिद आज़मी, शफीक़-उज़-ज़मां एडवोकेट, डॉ. मसीहुद्दीन खान, इब्राहिम निसार आज़मी, डॉ. सईद अख़्तर, डॉ. मुबश्शिरा लईक़ आदि शामिल थे।
सुमन सुप्रभात
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