Saturday, July 11, 2026
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केजीएमयू ट्रॉमा सेंटर में जटिल जीवनरक्षक ऑपरेशन से 34 वर्षीय युवक की बची जान

लखनऊ। किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (KGMU) के ट्रॉमा सेंटर के चिकित्सकों ने एक अत्यंत जटिल और दुर्लभ जीवनरक्षक शल्यक्रिया कर 34 वर्षीय युवक की जान बचाने में सफलता हासिल की। युवक की छाती में धारदार हथियार का ब्लेड धंसा हुआ था, जो दाहिने फेफड़े के संवेदनशील हिस्से (राइट पल्मोनरी हिलम) तक पहुंचकर पल्मोनरी आर्टरी की एक प्रमुख शाखा को क्षतिग्रस्त कर चुका था।
सरवेश (34) पर 4 जुलाई 2026 की रात लखीमपुर खीरी में धारदार हथियार से हमला किया गया। हमले के दौरान चाकू का ब्लेड उनकी दाहिनी छाती में धंस गया और वहीं फंसा रह गया। प्राथमिक उपचार के बाद उन्हें जिला अस्पताल, लखीमपुर खीरी से केजीएमयू ट्रॉमा सेंटर, लखनऊ रेफर किया गया, जहां 5 जुलाई की सुबह उन्हें भर्ती किया गया।
ट्रॉमा सेंटर पहुंचने पर एटीएलएस प्रोटोकॉल के तहत मरीज की जांच की गई। उस समय उसकी स्थिति स्थिर थी, लेकिन ब्लेड अब भी छाती में फंसा हुआ था। एक्स-रे में दाहिनी ओर हेमोथोरैक्स (छाती में रक्त भरना) और भीतर फंसा ब्लेड दिखाई दिया। चिकित्सकों ने तत्काल इंटरकॉस्टल ड्रेन (आईसीडी) डालकर लगभग 200 मिलीलीटर रक्त निकाला, जिससे फेफड़े का विस्तार बेहतर हुआ।

इसके बाद सीटी स्कैन में पता चला कि ब्लेड दाहिने पल्मोनरी हिलम तक पहुंच चुका है और पल्मोनरी आर्टरी की शाखा को नुकसान पहुंचा है। अनियंत्रित रक्तस्राव की आशंका को देखते हुए विशेषज्ञों ने सुनियोजित रणनीति के तहत ऑपरेशन करने का निर्णय लिया।
चिकित्सकों ने राइट एंटेरोलैटरल थोराकोटॉमी कर पहले रक्तवाहिनी पर सुरक्षित नियंत्रण स्थापित किया और फिर प्रत्यक्ष दृष्टि में सावधानीपूर्वक ब्लेड को निकाला। जांच में पल्मोनरी आर्टरी की एक शाखा गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त मिली, जिसका सफलतापूर्वक लिगेशन कर रक्तस्राव को नियंत्रित किया गया। इसके बाद फेफड़े को पुनः फैलाया गया तथा आईसीडी की दोबारा व्यवस्था की गई।
ऑपरेशन के दौरान हुए रक्तस्राव की भरपाई के लिए मरीज को तीन यूनिट पैक्ड रेड ब्लड सेल (PRBC) और चार यूनिट फ्रेश फ्रोजन प्लाज्मा (FFP) चढ़ाया गया। वर्तमान में मरीज की स्थिति स्थिर है और वह आईसीयू में विशेषज्ञ चिकित्सकों की निगरानी में तेजी से स्वस्थ हो रहा है।
इस जटिल ऑपरेशन का नेतृत्व डॉ. वैभव जायसवाल ने किया। टीम में डॉ. अनीकेश, डॉ. अर्पिता, डॉ. ताहिर, डॉ. प्रज्ज्वल, डॉ. महेश, डॉ. धैर्य, डॉ. मोहतास्सिन और डॉ. सागर शामिल रहे। ऑपरेशन की योजना बनाने में डॉ. यदवेंद्र धीर और प्रो. समीर मिश्रा का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा।
चिकित्सकों ने बताया कि छाती में धंसे किसी भी धारदार हथियार को ऑपरेशन थिएटर के बाहर कभी नहीं निकालना चाहिए, क्योंकि वह अस्थायी रूप से रक्तस्राव को रोक सकता है। ऐसे मामलों में पहले मरीज को स्थिर करना, आवश्यक जांच करना और ऑपरेशन थिएटर में उचित तैयारी के बाद ही हथियार निकालना सुरक्षित और जीवनरक्षक होता है।
विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. सोनिया नित्यानंद ने इस सफल उपचार के लिए पूरी चिकित्सा टीम को बधाई देते हुए कहा कि ट्रॉमा सेंटर ने एक बार फिर उत्कृष्ट आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं और विशेषज्ञता का परिचय दिया है तथा प्रदेश और देश में ट्रॉमा उपचार के क्षेत्र में अपनी अग्रणी भूमिका को सिद्ध किया है।

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